आजकल फिटनेस और बायोहैकिंग की दुनिया में एक नया चलन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है—स्वस्थ लोगों द्वारा continuous glucose monitors का इस्तेमाल। जो डिवाइस कभी सिर्फ डायबिटीज के मरीजों के लिए ब्लड शुगर ट्रैक करने का जरिया था, उसे अब आम लोग अपनी डाइट और लाइफस्टाइल को ऑप्टिमाइज करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन क्या एक स्वस्थ शरीर को वाकई हर मिनट शुगर लेवल मापने की जरूरत है? यह ट्रेंड आपकी सेहत सुधार रहा है या फिर बेवजह की एंग्जायटी बढ़ा रहा है, इसे गहराई से समझना जरूरी है।
सिलिकॉन वैली से शुरू हुआ बायोहैकिंग का क्रेज अब भारत में भी जगह बना रहा है। टेक-स्मार्ट युवा अपने शरीर के डेटा को ट्रैक करना पसंद करते हैं। ऐसे में continuous glucose monitors का उपयोग करके लोग यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि चावल, रोटी या कॉफ़ी पीने के बाद उनका ग्लूकोज लेवल कैसे प्रतिक्रिया देता है। विचार यह है कि स्पाइक्स को रोककर वजन नियंत्रित किया जाए और एनर्जी लेवल बनाए रखा जाए।
न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स के अनुसार, जब कोई स्वस्थ व्यक्ति कार्बोहाइड्रेट खाता है, तो ब्लड शुगर का बढ़ना पूरी तरह से स्वाभाविक है। हमारा अग्न्याशय (Pancreas) तुरंत इंसुलिन बनाकर इसे नियंत्रित कर लेता है।
जब एक स्वस्थ व्यक्ति हर छोटे स्पाइक को बीमारी समझकर भोजन छोड़ना या अत्यधिक परहेज करना शुरू कर देता है, तो यह मानसिक तनाव का कारण बनता है। अत्यधिक डेटा कभी-कभी खाने को लेकर डर पैदा कर देता है।
बिना डॉक्टरी सलाह के स्वस्थ शरीर पर मेडिकल सेंसर लगाना सेहत में सुधार के बजाय खाने से जुड़े मानसिक विकार पैदा कर सकता है।
अधिकांश डॉक्टरों का मानना है कि यदि आपको डायबिटीज नहीं है या आप प्री-डायबिटिक स्थिति में नहीं हैं, तो continuous glucose monitors का उपयोग केवल एक महंगा शौक है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद किसी भी बायोहैकिंग गैजेट से कहीं अधिक प्रभावी और सुरक्षित हैं।
क्या आप अपनी डाइट ट्रैक करने के लिए फिटनेस गैजेट्स का इस्तेमाल करते हैं? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताएं!









